देवास

संजा

हाटपिपल्या से संजय प्रेम जोशी की रिपोर्ट

कुँवारी लड़कियों की सखी ‘संजाबाई’ इन दिनों अपने पीहर में आई है। कुछ दिनों के लिए अपने पीहर में आई संजाबाई सा पार्वती जी का ही एक रूप है। जिनकी श्राद्धपक्ष में सोलह दिनों तक पूजा की जाती है। भारत के कई प्रांतों में संजा अलग-अलग रूप में पूजी जाती है। महाराष्ट्र में यही संजा ‘गुलाबाई’ बनकर एक माह तक अपने पीहर में रहती है तो वही राजस्थान में ‘संजाया’के रूप में श्राद्ध पक्ष में यह कुँवारी लड़कियों की सखी बन उनके साथ सोलह दिन बिताती है। कुँवारी लड़कियाँ संजाबाई की पूजा अच्छे वर की प्राप्ति के लिए करती है।

यदि हम मालवांचल की संजा की बात करे तो यहाँ के गाँवों में संजा का मजा ही कुछ ओर है। शाम ढलते ही गोबर से दीवारों पर संजा की आकृति सजना शुरू हो जाती है। उसके बाद गोबर से बनी संजाबाई को फूलों और रंग-बिरंगी चमक से सजाकर उनका श्रृंगार किया जाता है। संजा तैयार होने के बाद गाँव की लड़कियाँ सामूहिक रूप से संजा के गीत गाती है और बाद में उनकी आरती कर प्रसाद भी बाँटती है। आपसी मेलजोल बढाने का और अपनी संस्कृति व परंपराओं से जुड़े रहने का एक अच्छा बहाना है संजा।

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