देवास

सब आग में घी डालेंगे… तो आग बुझाएगा कौन?

विशेष संपादकीय

सब आग में घी डालेंगे… तो आग बुझाएगा कौन?

राजेश के व्यास, देवास

आजकल लगता है कि हमारे बीच गुस्सा बढ़ रहा है और धैर्य घट रहा है। ज़रा-सी असहमति बहस बन जाती है और बहस देखते ही देखते कटुता में बदल जाती है। ऐसे में समझाने वाली आवाज़ों से अधिक शोर उकसाने वालों का सुनाई देता है। सवाल है—यदि सब आग में घी डालेंगे, तो आग बुझाएगा कौन?

गुस्सा होना अस्वाभाविक नहीं है। अन्याय, उपेक्षा और लगातार अनसुना किए जाने से आक्रोश पैदा होता है। उसे समझना आवश्यक है। लेकिन किसी की पीड़ा का समाधान खोजना और उसी पीड़ा को अपने स्वार्थ के लिए भड़काना, दो अलग बातें हैं। हमारी ज़िम्मेदारी यहीं से शुरू होती है।

आग घरों की पहचान नहीं करती। वह यह नहीं देखती कि किसने उसे लगाया, किसने हवा दी और कौन चुपचाप अपने काम में लगा था। जब तनाव समाज में फैलता है, तो उसका असर रोज़गार, बच्चों की पढ़ाई, परिवारों की सुरक्षा और आपसी रिश्तों तक पहुँचता है। उससे वे लोग भी प्रभावित होते हैं, जिनकी उस विवाद में कोई भूमिका नहीं होती।

इसलिए हमें केवल उस गुस्से की चिंता नहीं करनी चाहिए जो दिखाई दे रहा है। उन लोगों को भी सुनना होगा, जो अपनी बात खुलकर कह नहीं पा रहे हैं। हर चुप्पी सहमति नहीं होती। उसके पीछे भय, विवशता, निराशा या यह अनुभव भी हो सकता है कि उनकी बात सुनी ही नहीं जाएगी। संवाद का उद्देश्य केवल बोलने का अवसर देना नहीं, सुनने और समझने की इच्छा रखना भी है।

चिंता तब और बढ़ती है, जब किसी घटना को समझने से पहले पक्ष चुन लिया जाता है। अधूरी जानकारी निष्कर्ष बन जाती है और दूसरों की पीड़ा को भी अपने पक्ष की सुविधा से देखा जाने लगता है। ऐसी स्थिति में सच पीछे छूट जाता है और अविश्वास बढ़ता जाता है।

मतभेद लोकतांत्रिक जीवन का हिस्सा हैं। सवाल पूछना, असहमति रखना और अन्याय का विरोध करना आवश्यक है। मगर अपने विचार के प्रति दृढ़ता हमें दूसरे के अपमान या उसके विरुद्ध हिंसा को उचित ठहराने का अधिकार नहीं देती। विरोध की गरिमा और व्यक्ति की गरिमा—दोनों बचाई जा सकती हैं।

इसके लिए ज़िम्मेदारी भी सबको निभानी होगी। सार्वजनिक जीवन में प्रभाव रखने वालों को अपने शब्दों के परिणाम समझने होंगे। मीडिया को तथ्य जाँचने और घटनाओं का संदर्भ स्पष्ट करने की ज़िम्मेदारी निभानी होगी। प्रशासन को शिकायतों पर समय रहते निष्पक्ष कार्रवाई करनी होगी। और हम नागरिकों को किसी उत्तेजक संदेश को आगे बढ़ाने से पहले ठहरकर पूछना होगा—क्या यह सच है? क्या इसे साझा करने से किसी निर्दोष को नुकसान हो सकता है?

शांति की अपील तभी सार्थक होगी, जब उसके साथ न्याय और सुनवाई का भरोसा भी हो। केवल चुप हो जाने को कहना पर्याप्त नहीं है; उन कारणों को दूर करना भी ज़रूरी है, जिनसे आक्रोश जन्म लेता है।

हमें अपने तात्कालिक स्वार्थों से ऊपर उठकर यह सोचना होगा कि आज हम जिस व्यवहार को बढ़ावा दे रहे हैं, कल वही हमारे जीवन को किस दिशा में ले जाएगा। परिस्थितियाँ बिगड़ने के बाद सद्भाव लौटाना कठिन होता है। इसलिए संयम दिखाने और संवाद शुरू करने का समय अभी है।

अपने विचार, अपनी पहचान और अपने अधिकार—सब ज़रूरी हैं। लेकिन इनके साथ उस साझा ज़मीन को बचाना भी ज़रूरी है, जिस पर हमारा जीवन टिका है। वह ज़मीन है—समाज में भरोसा, न्याय की उम्मीद और असहमत होकर भी साथ रहने की क्षमता।

आग बुझाएगा कौन—यह सवाल दूसरों से पूछने के साथ हमें स्वयं से भी पूछना होगा। शुरुआत इतनी तो हो सकती है कि हम अपने हिस्से का घी उसमें न डालें।

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