देवास

एआई का दौर है… डिजिटल के मंच हैं… “राजनीति”

राजेश व्यास।

हम आजकल पोस्ट पढ़ते हैं। स्टेटस देख लेते हैं। तस्वीरों में सब मुस्कुरा रहे होते हैं। सुख-दुख में आने-जाने के संस्कार बने हुए हैं। सबकुछ संस्कृति, संस्कारों में बंधा हुआ दिखाई देता है। तस्वीरें बोलती हैं…

आजकल सबके पास मंच हैं। फालोवर्स के बड़े बड़े आंकड़े हैं। सबके अकाउंट एक्टिव हैं। डिजिटल टीम हैं और सभी, सभी नहीं तो ज्यादातर नेतृत्व के पास उनकी खुद की, स्वयं की चलती फिरती टीम है।

यह डिजिटल युग का बदला हुआ दौर और सबकुछ तस्वीरों में बेहतरीन दिखाई जाने वाले अपडेट्स। टीम एक्टिव और अट्रेक्ट कंटेंट पोस्ट करने में माहिर। हम इसी दौर में खोज रहे हैं, हम से आशय कुछ चिंतक, कुछ पत्रकार साथी, वे तस्वीरें जो बन जाएं हैडलाइंस, बन जाएं बेकिंग न्यूज़, या यूं कहें कि कुछ मसाला, और बने चर्चा का विषय, किंतु अब जब सबके हाथ में है मोबाइल और सब कोशिश करते बेहतर कंटेंट अपलोड करने की, इन्हीं बेहतर और बेहतरीन तस्वीरों में से खोजना है अब, तस्वीरों के पीछे की कहानी, यह जाल है.. बड़ा जाल है.. यहीं जंजाल भी हो सकता है तय नहीं है कुछ भी, जो दिखाई दे रहा है या जो दिखाया जा रहा है वह किसके लिए कितना सच और किसके लिए कितना झूठ, सब अपने अपने हिस्से का हिसाब खुद करें।

आप के भी खुद के अकाउंट होंगे। आप हम भी तो यही करते हैं। किंतु सबकी अपनी-अपनी कहानियां हैं, इन्हीं कहानियों में उलझे हुए हैं सच, संस्कार, संस्कृति और दिनभर के अनेक अनेक प्रसंग,

अब बहुत मुश्किल है इन मुस्कुराते हुए चेहरों की अपेक्षाओं, उपेक्षाओं और उपलब्धियों के लिए दिन-रात एक करते हुए संघर्ष की कहानियों को पढ़ पाना।

ऐसा ही कुछ लगता है सभी के मुस्कुराते हुए चेहरों को देखकर, किंतु मन मानव मन, संतत्व भाव , या कोई भी भाव समय के साथ बदलते रहते हैं यह प्राकृतिक है और अभिलाषाएं, अपेक्षाएं, उपेक्षाएं… इन्हीं में कहीं छिपे होते हैं और इन्ही में मिलते हैं इन्हीं प्रश्नों के उत्तर।

आशय यह नहीं है कि किसी भी स्थिति का विरोध या आलोचना की जा रही हो, आशय यह भी नहीं है कि सबकुछ गलत है, किंतु हमेशा सबकुछ सही है यह भी तो, सही नहीं है।

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