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शादी में महिला को मिलने वाले गहने और सामान पर किसका हक? सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला

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सुप्रीम कोर्ट - India TV Hindi

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सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली: शादी में महिला को मिलने वाले गहने और अन्य सामान पर सिर्फ महिला का हक है। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को फैसला सुनाया कि एक महिला अपने ‘स्त्रीधन’, शादी के समय अपने माता-पिता द्वारा दिए गए सोने के गहने और अन्य सामान की एकमात्र मालिक है। कोर्ट ने कहा कि ‘स्त्रीधन’ पर महिला के पति का भी अधिकार नहीं है। तलाक के बाद अगर महिला स्वस्थ और फैसले लेने में सक्षम है तो ‘स्त्रीधन’ पर उसके पिता का भी हक नहीं है।

क्या है ‘स्त्रीधन’ 

सुप्रीम कोर्ट ने तलाक के बाद ‘स्त्रीधन’ को लेकर दायर किए गए एक केस की सुनवाई करने के बाद यह बातें कही। बता दें कि  ‘स्त्रीधन’ वह चीज होता है जो शादी के दौरान महिला को मिलता है। जैसे की गहने और अन्य सामान। 

क्या है पूरा मामला

दरअसल, तेलंगाना के पडाला के  पी वीरभद्र राव की बेटी की शादी दिसंबर 1999 में हुई और दंपति अमेरिका चले गए। वीरभद्र राव ने शादी के दौरान बेटी को कई गहने और उपहार दिए थे। शादी के बाद अमेरिका में महिला और पति के बीच अनबन हुई और दोनों ने शादी के16 साल बाद तलाक ले लिए। बेटी ने दूसरी शादी कर ली। वीरभद्र राव ने बेटी के पूर्व ससुराल वालों के खिलाफ केस कर ‘स्त्रीधन’ पर अपना हक जताया। बाद में यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया।

पूर्व ससुराल वालों ने एफआईआर को रद्द करने के लिए तेलंगाना हाई कोर्ट का रुख किया। वहां राहत नहीं मिली तो हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की। न्यायमूर्ति जे के माहेश्वरी और न्यायमूर्ति संजय करोल की पीठ ने ससुराल वालों के खिलाफ मामला रद्द कर दिया और कहा कि पिता के पास अपनी बेटी का ‘स्त्रीधन’ वापस मांगने का कोई अधिकार नहीं है। क्योंकि वह पूरी तरह से उसका था। 

जस्टिस करोल ने फैसले में कही ये बात

जस्टिस करोल ने फैसला लिखते हुए कहा, “आम तौर पर स्वीकृत नियम, जिसे न्यायिक रूप से मान्यता दी गई है, वह यह है कि महिला संपत्ति पर पूर्ण अधिकार रखती है।  ‘स्त्रीधन’ की एकमात्र मालिक होने के नाते महिला (जैसा भी मामला हो पत्नी या पूर्व पत्नी) के एकमात्र अधिकार के संबंध में स्पष्ट है। इसको लेने का पति के पास कोई अधिकार नहीं है। 

न्यायमूर्ति करोल ने कहा कि पिता के दावे के खिलाफ एक और महत्वपूर्ण तत्व यह था कि उन्हें अपनी बेटी द्वारा अपने ‘स्त्रीधन’ की वसूली के लिए कार्रवाई शुरू करने के लिए अधिकृत नहीं किया गया था। अदालत ने यह भी पाया कि पिता ने 1999 में अपनी बेटी की शादी के समय उसे कोई ‘स्त्रीधन’ दिए जाने का कोई सबूत नहीं दिया था और विवाह के पक्षों ने 2016 के अपने अलगाव समझौते में कभी भी ‘स्त्रीधन’ का मुद्दा नहीं उठाया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “इस बात का कोई सबूत नहीं है कि दावा किया गया ‘स्त्रीधन’ बेटी के ससुराल वालों के कब्जे में था। 

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