देवास

विरोध की मर्यादा और देश की छवि: क्या अभद्र भाषा से मजबूत होगी लोकतंत्र की आवाज?

विशेष संपादकीय। वर्षा व्यास, क्रिएटिव एडिटर। इन्फार्म ह्यूमन

आज के डिजिटल और सोशल मीडिया के दौर में किसी भी देश का कोई स्थानीय मुद्दा केवल उसकी सीमाओं तक सीमित नहीं रहता। चाहे वह कोई नीतिगत विरोध हो, परीक्षा विवाद हो या सामाजिक आंदोलन—पलक झपकते ही उसकी तस्वीरें, वीडियो और स्वर वैश्विक मंच पर पहुंच जाते हैं। दुनिया भर की मीडिया और अंतरराष्ट्रीय समुदाय यह बारीकी से देखते हैं कि कोई राष्ट्र अपने नागरिकों के मुद्दों को कैसे संभालता है और उस देश की युवा पीढ़ी अपने विचारों को कैसे व्यक्त करती है।

हाल के दिनों में भारत में NEET परीक्षा को लेकर उठी चिंताएं और छात्रों का आक्रोश एक बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण विषय रहा है। लाखों युवाओं के भविष्य से जुड़े इस मुद्दे पर आवाज उठाना, सवाल पूछना और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना हर नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन इस विरोध प्रदर्शन के दौरान जिस तरह से कुछ युवाओं द्वारा अभद्र भाषा और मर्यादाहीन टिप्पणियों का सहारा लिया गया, उसने एक गंभीर बहस को जन्म दे दिया है।

विरोध और मर्यादा: क्या यही है देश का भविष्य?
लोकतंत्र में असहमति की जगह हमेशा होती है, और जब बात युवाओं के भविष्य की हो, तो उनका आक्रोश समझ में आता है। लेकिन जब विरोध का स्वरूप वैचारिक न रहकर निजी लांछन और अभद्र शब्दावली में बदल जाता है, तब मूल मुद्दा पीछे छूट जाता है।

जब देश के प्रधानमंत्री या किसी भी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ सार्वजनिक रूप से अभद्र भाषा का प्रयोग किया जाता है, तो सवाल केवल एक व्यक्ति का नहीं रह जाता। सवाल यह उठता है कि:

क्या आक्रोश व्यक्त करने का एकमात्र माध्यम शब्दों की मर्यादा तोड़ना है?

क्या हमारी शिक्षा और संस्कार हमें असहमति के दौरान भी गरिमा बनाए रखना नहीं सिखाते?

युवा किसी भी देश का भविष्य और उसकी बौद्धिक पहचान होते हैं। जब दुनिया यह देखती है कि देश के सबसे योग्य और प्रतिस्पर्धी छात्र (जो कल के डॉक्टर, इंजीनियर या प्रशासक बनेंगे) विरोध दर्ज कराने के लिए अभद्र शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं, तो यह उनकी नेतृत्व क्षमता और परिपक्वता पर सवाल खड़े करता है।

वैश्विक मंच पर देश और संस्कृति की छवि
भारत की पहचान पूरी दुनिया में उसकी समृद्ध संस्कृति, ‘अतिथि देवो भव’ के विचार और अनुशासित नागरिक मूल्यों के लिए रही है। हमारे संस्कार सिखाते हैं कि विरोध कितना भी तीखा क्यों न हो, वाणी की गरिमा कभी नहीं खोनी चाहिए।

जब विदेश में बैठे लोग या अंतरराष्ट्रीय मीडिया ऐसे वीडियो देखते हैं जहाँ देश के सर्वोच्च नेतृत्व के प्रति बेहद अशोभनीय बातें कही जा रही हों, तो उससे दो मुख्य बातें सामने आती हैं:

संस्कारों पर प्रश्नचिह्न: इससे दुनिया के सामने हमारी सांस्कृतिक नींव और नैतिक मूल्यों (संस्कारों) का गलत संदेश जाता है।

संवाद के स्तर में गिरावट: यह संकेत मिलता है कि हमारे राजनीतिक व सामाजिक संवाद का स्तर गिर रहा है, जहाँ तर्कों की जगह गाली-गलौज और अभद्रता लेती जा रही है।

सशक्त विरोध के लिए संयम और तर्क की आवश्यकता
इतिहास गवाह है कि दुनिया के सबसे बड़े आंदोलन—चाहे वह भारत का स्वतंत्रता संग्राम हो या नागरिक अधिकारों की लड़ाई—अहिंसा, भाषा की गरिमा और मजबूत तर्कों के बल पर जीते गए हैं। महात्मा गांधी से लेकर डॉ. बी.आर. अंबेडकर तक, किसी ने भी अपनी बात मनवाने के लिए भाषा का स्तर नहीं गिरने दिया।

NEET जैसी परीक्षाओं में पारदर्शिता की मांग पूरी तरह जायज है और इसके लिए सरकार व व्यवस्था से सख्त सवाल पूछे जाने चाहिए। लेकिन यदि विरोध की भाषा संयमित, तर्कपूर्ण और तथ्य आधारित होगी, तो उसे समाज और वैश्विक समुदाय का अधिक समर्थन मिलेगा।

निष्कर्ष
आक्रोश और असंतोष का होना जीवंत लोकतंत्र की निशानी है, लेकिन भाषा की मर्यादा बनाए रखना एक परिपक्व समाज का लक्षण है। युवाओं को यह समझना होगा कि वे केवल अपना विरोध दर्ज नहीं करा रहे हैं, बल्कि पूरे देश का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। यदि हम दुनिया के सामने एक सशक्त, संस्कारी और विश्वगुरु बनने की आकांक्षा रखने वाले भारत का निर्माण करना चाहते हैं, तो हमें अपनी असहमति में भी गरिमा और संस्कारों का परिचय देना होगा।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button

You cannot copy content of this page