देवास

सेवा की सजीव प्रतिमूर्ति – डॉ. रश्मि पांडेकर


इन्फार्म ह्यूमन, देवास।

मानवता जब थक कर चूर हो जाती है, जब सिस्टम जवाब दे देता है, जब उम्मीद की लौ बुझने लगती है, तब कुछ लोग दीया बनकर जलते हैं। डॉ. रश्मि पांडेकर उन्हीं दीयों में से एक नाम हैं। एक ऐसा नाम जिसे सुनकर अस्पतालों की सफेद दीवारों में भी जीवन की गर्माहट महसूस होने लगती है। एक ऐसा व्यक्तित्व जिसने ‘सेवा’ शब्द को अपनी साँसों में बसाया है।

1. नींव में करुणा: सेवा से शुरू हुई साधना
डॉ. रश्मि पांडेकर का जीवन परिचय किसी पद या उपाधि से शुरू नहीं होता। वह शुरू होता है संवेदना से। चिकित्सा क्षेत्र में प्रवेश करते ही उन्होंने तय कर लिया था कि उनके लिए यह पेशा नहीं, पूजा है। एक नर्स के रूप में उन्होंने हजारों मरीजों की सेवा की। उनके लिए वार्ड का हर बेड एक मंदिर था और हर मरीज उसमें विराजमान ईश्वर।

उनके सहकर्मी आज भी बताते हैं कि रश्मि मैडम की ड्यूटी कभी घड़ी की सुई से नहीं बंधी। रात के समय भी इमरजेंसी आई तो वे तत्परता से पहुँचती थीं। कई बार तो वे अपनी शिफ्ट खत्म होने के बाद भी गंभीर मरीजों के पास समय देती थीं। सिर्फ दवा देना उनका काम नहीं था। मरीज के सिर पर हाथ फेरना, उसके परिवार को ढाढ़स बँधाना, मरीज को यह विश्वास दिलाना कि वह अकेला नहीं है, ये सब वे अपना धर्म मानती थीं।

वे कहती हैं, “नर्स का काम इंजेक्शन लगाना नहीं है। नर्स का काम उस डर को दूर करना है जो मरीज के मन में बैठा है।” इसी भाव ने उन्हें मरीजों के हृदय से जोड़ा। मरीज डिस्चार्ज होकर भी सालों तक उन्हें कृतज्ञता से याद रखते थे। यह रिश्ता दवा और मरीज का नहीं था, यह आत्मीयता का रिश्ता बन गया था।

2. कोरोना काल: संकट में अडिग सेवा
वर्ष 2020 ने मानवता की सबसे बड़ी परीक्षा ली। कोरोना महामारी जब चरम पर थी, उस समय रश्मि पांडेकर ने घर और परिवार की चिंता छोड़कर अस्पताल को ही अपना कार्यक्षेत्र बना लिया। पीपीई किट का वो दमघोंटू सूट, चेहरे पर निशान छोड़ देने वाला N95 मास्क, लंबी शिफ्ट, और सामने बीमारी से जूझते चेहरे।

उस दौर में उन्होंने जो किया वो सिर्फ ड्यूटी नहीं थी। वे मरीजों की देखभाल में पूरी तरह समर्पित रहीं। जब परिजन मरीज के पास जाने से संकोच करते थे, तो वे खुद मरीजों की सहायता करती थीं। उनकी इसी निस्वार्थ, अदम्य साहस और समर्पण की गाथा को सम्मान मिला। भारत सरकार ने उनके सेवा-कार्यों को देखते हुए उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार से अलंकृत किया। यह सम्मान उनके सेवाभाव का प्रतीक है।

3. सेवानिवृत्ति नहीं, सेवा-निवृत्ति
सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त होना एक पड़ाव है, अंत नहीं। रश्मि मैडम ने इसे शब्दशः साबित किया है। जिस दिन वे औपचारिक रूप से सेवानिवृत्त हुईं, उसके बाद भी वे समाज सेवा के कार्यों से जुड़ी रहीं।

आज भी वे समाज के वंचित वर्ग के लिए लगातार सक्रिय हैं। उनके लिए इंसान की पहचान उसकी जाति या धर्म से नहीं, उसकी आवश्यकता से होती है। वे मानती हैं कि भूख का कोई धर्म नहीं होता और बीमारी कोई जाति देखकर नहीं आती। इसलिए उनकी सेवा का दायरा बहुत व्यापक है। वे जरूरतमंद लोगों की सहायता के लिए काम करती हैं।

सेवानिवृत्ति के बाद उनके पास समय ही समय है, और वे इस समय का एक-एक पल समाज को समर्पित कर रही हैं। उनके लिए संतोष का मतलब है किसी जरूरतमंद के चेहरे पर मुस्कान देखना।

4. स्मृतियों में बसी सेवा
डॉ. रश्मि पांडेकर एक संवेदनशील इंसान हैं। जब वे अपने लंबे सेवाकाल को याद करती हैं, तो कई प्रसंग ऐसे हैं जिन्हें याद कर उनकी आँखें भर आती हैं। उनके लिए हर मरीज का अनुभव अनमोल है। वे कहती हैं, “मैंने तनख्वाह के लिए नौकरी नहीं की। मैंने सेवा के लिए जीवन जिया है।” ये आशीर्वाद और लोगों की दुआएँ ही उनकी असली कमाई हैं।

5. विरासत के लिए एक प्रेरणा
डॉ. रश्मि पांडेकर का जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा है। यह सिखाता है कि डिग्री से बड़ा होता है नजरिया। यह सिखाता है कि पद से बड़ा होता है समर्पण। यह सिखाता है कि इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं होता।

उन्होंने अपने जीवन से साबित किया है कि अगर नीयत साफ हो तो एक व्यक्ति भी समाज में सकारात्मक बदलाव ला सकता है। वे आज की युवा पीढ़ी, खासकर चिकित्सा क्षेत्र में आने वाले युवाओं के लिए एक जीवंत मिसाल हैं।


📜 इनफॉर्म ह्यूमन विशेष घोषणा

इनफॉर्म ह्यूमन द्वारा पचमढ़ी में 19-21 जून 2026 को आयोजित “सत्य उदय सम्मिट” विचार सम्मेलन में राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित समाजसेविका डॉ. रश्मि पांडेकर विशेष वक्ता के तौर पर सम्मिलित हो रही हैं।

अपने ओजस्वी विचारों, जीवन के अनुभवों और सेवा की अनुपम गाथाओं से रश्मि मैडम हम सबको गौरान्वित करेंगी। “विरासत” स्मारिका में उनका सान्निध्य हम सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगा।

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