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इन्फार्म ह्यूमन, देवास। योग सिर्फ आसन और प्राणायाम का नाम नहीं है। योग एक जीवन पद्धति है, एक दर्शन है, एक संकल्प है। और जब यह संकल्प किसी व्यक्ति के जीवन का ध्येय बन जाए, तो वह व्यक्ति नहीं, एक संस्था बन जाता है। ऐसे ही एक नाम हैं – योग विशेषज्ञ चंद्रशेखर तिवारी

चंद्रशेखर तिवारी योग के गहरे जानकार हैं। उनके लिए योग करियर नहीं, कर्म है। पूजा नहीं, परोपकार है। उनका पूरा जीवन मानवता के लिए समर्पित है। वे मानते हैं कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का वास होता है, और स्वस्थ मन ही स्वस्थ समाज का निर्माण कर सकता है। इसी सोच के साथ वे पिछले कई वर्षों से लगातार मेहनत कर रहे हैं – न थकते हैं, न रुकते हैं।

धर्मपत्नी मोनू तिवारी: संगिनी भी, सहयोगिनी भी

चंद्रशेखर तिवारी जी के इस योग-यज्ञ में उनकी धर्मपत्नी श्रीमती मोनू तिवारी भी पूर्ण आहुति दे रही हैं। वे भी योग विशेषज्ञ हैं। यह जोड़ी सिर्फ पति-पत्नी की नहीं, दो साधकों की है जो एक ही लक्ष्य के लिए समर्पित हैं।

कहते हैं कि जब पति-पत्नी एक ही दिशा में चलें तो राह आसान हो जाती है। चंद्रशेखर जी और मोनू जी के साथ भी यही हुआ। दोनों मिलकर योग के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान दे रहे हैं। मोनू जी विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों के लिए योग सत्र संचालित करती हैं। पीरियड्स, प्रेग्नेंसी, मेनोपॉज, डिप्रेशन – ऐसे विषयों पर वे योग के माध्यम से समाधान देती हैं जिन पर खुलकर बात भी नहीं होती।

सेवाएं वंदनीय, अभिनंदन के योग्य

इन दोनों की सेवाएं वंदनीय हैं। अभिनंदन के योग्य हैं। क्यों? क्योंकि इन्होंने योग को एसी कमरों और महंगे स्टूडियो से निकालकर आम आदमी तक पहुंचाया है।

चंद्रशेखर तिवारी जी का मानना है कि योग कोई लग्जरी नहीं, जरूरत है। डायबिटीज, बीपी, थायरॉइड, स्लिप डिस्क, साइटिका, एंग्जाइटी, डिप्रेशन – हर मर्ज की दवा योग में है। लेकिन दवा तभी असर करती है जब सही डोज में, सही तरीके से ली जाए। यही काम तिवारी दंपति कर रहे हैं। पार्कों में, स्कूलों में, ऑफिसों में निःशुल्क शिविर लगाते हैं।

कोविड काल में जब दुनिया घरों में कैद थी, तब चंद्रशेखर जी और मोनू जी ने ऑनलाइन योग सत्र शुरू किए। हजारों लोगों ने घर बैठे-बैठे इम्युनिटी बढ़ाई, तनाव घटाया, सांसों को संभाला। कई लोगों ने तो यहाँ तक कहा कि “ऑक्सीजन लेवल गिर रहा था, तिवारी जी के प्राणायाम से संभल गया।” यही सेवा है, यही समर्पण है।

विशेषज्ञता ऐसी कि शहर-शहर सेमिनार

श्री तिवारी योग के क्षेत्र में विशेषज्ञ इतने हैं कि विभिन्न शहरों में उनके विशेष सेमिनार आयोजित किए जाते हैं। इंदौर, भोपाल, उज्जैन – जहाँ-जहाँ से बुलावा आता है, तिवारी जी पहुंच जाते हैं।

उनके सेमिनार की खासियत ये है कि वे सिर्फ आसन नहीं सिखाते। वे योग का विज्ञान समझाते हैं। कौन सा आसन किस नाड़ी पर काम करता है, कौन सा प्राणायाम किस चक्र को जागृत करता है, कौन सा मंत्र किस मानसिक स्थिति में सहायक है – यह सब वे सरल भाषा में बताते हैं।

कॉर्पोरेट सेक्टर में ‘डेस्क योग’, स्कूलों में ‘एग्जाम स्ट्रेस योग’, सीनियर सिटीजन के लिए ‘चेयर योग’, महिलाओं के लिए ‘हार्मोनल बैलेंस योग’ – उन्होंने योग को हर वर्ग के लिए कस्टमाइज किया है।

पुरस्कारों से सम्मानित योग-युगल

दोनों को अब तक कई पुरस्कार मिल चुके हैं। जिला प्रशासन, राज्य सरकार, सामाजिक संगठन, योग संस्थाएं – सभी ने समय-समय पर चंद्रशेखर जी और मोनू जी को सम्मानित किया है। ‘योग रत्न’, ‘योग भूषण’, ‘समाज गौरव’, ‘नारी शक्ति सम्मान’ – लिस्ट लंबी है।

लेकिन तिवारी जी कहते हैं, “सबसे बड़ा पुरस्कार तब मिलता है जब कोई व्यक्ति आकर कहता है – सर, आपकी बताई भस्त्रिका से मेरी 10 साल पुरानी अस्थमा ठीक हो गई। मैडम, आपके सूर्य नमस्कार से मेरा 8 किलो वजन कम हो गया।” उनके लिए यही असली ट्रॉफी है।

विरासत में मिला योग, संस्कार में बसा योग

श्री तिवारी के पिता भी योग और आयुर्वेद के गहरे जानकार हैं। घर में सुबह 4 बजे उठने का नियम था। ब्रह्ममुहूर्त में उठकर नहाना, फिर एक घंटा योग-प्राणायाम, उसके बाद गीता पाठ। चंद्रशेखर जी ने बचपन से यही देखा, यही सीखा।

पिता जी कहते थे, “बेटा, शरीर भगवान का मंदिर है। इसे गंदा मत रखो। योग करो, सात्विक खाओ, सच बोलो।” यही संस्कार चंद्रशेखर जी के रोम-रोम में बसे हैं। और अब यही संस्कार उनके बच्चों में भी हैं।

उनके बच्चे भी सुबह जल्दी उठते हैं। मोबाइल से पहले मैट पर जाते हैं। जंक फूड की जगह फल खाते हैं। कार्टून की जगह रामायण देखते हैं। तिवारी परिवार की तीन पीढ़ियां योगमय हैं। यह विरासत पैसों से बड़ी है।

व्यक्तित्व: आकर्षक और सकारात्मक

श्री तिवारी का व्यक्तित्व आकर्षक है, सकारात्मक है। 50 पार की उम्र में भी उनका शरीर 30 साल के युवा जैसा तना हुआ है। चेहरे पर तेज है, आँखों में चमक है, आवाज में ओज है।

लोग उन्हें देखते ही पूछते हैं – “सर, आपकी उम्र कितनी है?” जब वे असली उम्र बताते हैं तो सामने वाला चौंक जाता है। फिर अगला सवाल होता है – “राज क्या है?” जवाब मिलता है – “योग।”

उनकी सकारात्मकता संक्रामक है। वे जहाँ जाते हैं, माहौल बदल जाता है। नेगेटिव बात करने वाले के सामने भी वे मुस्कुराकर कहते हैं, “भाई, 10 बार ओम बोलो, सब ठीक हो जाएगा। उनकी उपस्थिति मात्र से लोगों को ऊर्जा मिलती है।

लगातार मेहनत, अथक परिश्रम

चंद्रशेखर तिवारी जी लगातार मेहनत करते हैं। उनका दिन सुबह 4 बजे शुरू होता है। 4 से 6 स्वयं का अभ्यास। 6 से 8 पहला बैच। 8 से 10 दूसरा बैच। फिर नाश्ता करके सेमिनार, मीटिंग, स्कूल विजिट। शाम 5 से 7 फिर दो बैच। रात 9 बजे तक पेरेंट्स के फोन, डाइट प्लान, फॉलोअप।

संडे को भी छुट्टी नहीं। संडे को विशेष रोगों का बैच होता है – डायबिटीज, थायरॉइड, स्लिप डिस्क। मोनू जी भी इसी शेड्यूल में साथ देती हैं। महिला बैच, प्रेग्नेंसी योग, किड्स योग – सब संभालती हैं।

थकते नहीं? पूछने पर हँसकर कहते हैं, “जब काम धर्म बन जाए तो थकान नहीं होती। जब सेवा आदत बन जाए तो बोझ नहीं लगता।”

निष्कर्ष: योग से युग निर्माण

चंद्रशेखर तिवारी और मोनू तिवारी सिर्फ योग टीचर नहीं हैं। वे योग के ब्रांड एंबेसडर हैं। वे उस परंपरा के वाहक हैं जो हजारों साल पुरानी है, लेकिन आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।

उन्होंने साबित किया है कि पति-पत्नी अगर एक मिशन पर चलें तो समाज बदल सकता है। उन्होंने दिखाया है कि योग सिर्फ भारत की धरोहर नहीं, भारत का भविष्य भी है।

उनकी सेवाएं सचमुच वंदनीय हैं। उनका अभिनंदन होना ही चाहिए। क्योंकि वे सिर्फ शरीर नहीं सुधार रहे, समाज सुधार रहे हैं। एक-एक व्यक्ति को जोड़कर, एक-एक सांस को साधकर, वे युग निर्माण कर रहे हैं।

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