देवास

पायल पालीवाल: वात्सल्य से वातावरण बदलने वाली एक शख्सियत

इन्फार्म ह्यूमन, देवास ।पायल पालीवाल एर्गो किड्स के साथ जुड़कर उन बच्चों के लिए काम कर रही हैं जिन्हें विशेष थेरेपी और सबसे ज्यादा विशेष अपनत्व की जरूरत होती है। ऑटिज्म, सेरेब्रल पाल्सी, डेवलपमेंटल डिले, स्पीच डिसऑर्डर, लर्निंग डिसएबिलिटी – ऐसे सैकड़ों केस हैं जहाँ उम्मीद की लौ सबसे पहले माँ-बाप के दिल में बुझती है। पायल उसी लौ को फिर से जलाने का काम करती हैं।

समर्पण भाव से शुरू हुआ सफर

पायल पालीवाल ने अपना करियर एक सामान्य रास्ते पर शुरू किया हो सकता था। डिग्री, प्रैक्टिस, क्लिनिक – सब कुछ आसान रास्ता था। लेकिन उन्होंने एर्गो किड्स के माध्यम से उस रास्ते को चुना जहाँ हर दिन एक नई चुनौती है और हर छोटी जीत एक बड़ा त्योहार। समर्पण उनके लिए शब्द नहीं, जीवनशैली है।

वे कहती हैं कि विशेष बच्चों के साथ काम करना कोई 9 से 5 की नौकरी नहीं है। यह 24 घंटे का संकल्प है। एक बच्चे को ‘माँ’ बोलना सिखाने में महीनों लग सकते हैं। किसी बच्चे को चम्मच पकड़ना सिखाने में साल भर की मेहनत लग जाती है। लेकिन जब वो पहला शब्द निकलता है, जब वो पहली बार खुद से खाना खाता है – उस पल में जो खुशी मिलती है, वो किसी भी सैलरी से बड़ी होती है। यही समर्पण भाव पायल को दूसरों से अलग बनाता है।

वात्सल्य भाव: प्रोफेशनल नहीं, दूसरी माँ

एर्गो किड्स के सेंटर में अगर आप जाएं तो आपको पायल पालीवाल एक प्रोफेशनल कम और माँ ज्यादा नजर आएंगी। वात्सल्य भाव उनकी सबसे बड़ी ताकत है। विशेष बच्चों के माता-पिता पहले ही समाज के तानों, रिश्तेदारों के सवालों और अपने ही डर से टूटे हुए होते हैं। ऐसे में जब मदद करने वाला भी सिर्फ प्रोफेशनल दूरी बनाकर काम करे, तो healing अधूरी रह जाती है।

पायल हर बच्चे को गोद में बिठाती हैं। उसके बाल सहलाती हैं। उसकी आँखों में आँखें डालकर बात करती हैं, भले ही बच्चा verbal ना हो। वे मानती हैं कि थेरेपी टेबल पर नहीं, भरोसे के रिश्ते से शुरू होती है। जब बच्चा सामने वाले को देखकर डरेगा नहीं, मुस्कुराएगा – तभी असली सुधार शुरू होगा। इसी वात्सल्य भाव के कारण एर्गो किड्स के सेंटर में बच्चे रोते हुए नहीं, खिलखिलाते हुए आते हैं।

एक सेंटर, हजार उम्मीदें – सब अकेले

पायल पालीवाल ने सिर्फ एर्गो किड्स के लिए काम नहीं किया, उन्होंने एक पूरा सेंटर संचालित किया है जहाँ स्पेशल एजुकेशन एक ही छत के नीचे मिलती है। और सबसे बड़ी बात – वे यह सब काम अकेले ही करती हैं।

इस सेंटर की खास बात ये है कि यहाँ ‘इलाज’ नहीं ‘विकास’ होता है। यहाँ बच्चों को मशीन की तरह ठीक नहीं किया जाता, इंसान की तरह संवारा जाता है। हर बच्चे का प्लान अलग, हर बच्चे की गति अलग, हर बच्चे की जरूरत अलग। पायल खुद हर केस को मॉनिटर करती हैं। वे जानती हैं कि कौन सा बच्चा रंगों से रिएक्ट करता है, कौन सा म्यूजिक से, कौन सा खिलौने से।

सेंटर में दीवारों पर कार्टून हैं, फर्श पर मैट हैं, कोने में सेंसरी टॉयज हैं। यह घर ज्यादा लगता है। क्योंकि पायल मानती हैं कि डर के माहौल में कोई सीख नहीं सकता। सुरक्षा और अपनापन पहली थेरेपी है। एक अकेली महिला पूरे सेंटर को चलाती है – प्लानिंग से लेकर थेरेपी तक, पेरेंट काउंसलिंग से लेकर रिकॉर्ड मेंटेनेंस तक।

ईमानदारी, मेहनत और सकारात्मकता – तीन स्तंभ

पायल पालीवाल की कार्यशैली तीन स्तंभों पर टिकी है।

पहला – ईमानदारी। वे माता-पिता को कभी झूठे सपने नहीं दिखातीं। अगर किसी बच्चे में सुधार की गति धीमी है, तो वे साफ कहती हैं। अगर 6 महीने लगेंगे, तो 2 महीने का वादा नहीं करतीं। यही ईमानदारी उनके प्रति पेरेंट्स का भरोसा बनाती है। आज के दौर में जब थेरेपी सेंटर कमर्शियल हो गए हैं, पायल का यह गुण उन्हें भीड़ से अलग करता है।

दूसरा – मेहनत। उनका दिन सुबह 8 बजे सेंटर में शुरू होता है और शाम 7 बजे खत्म होता है। बीच में एक-एक बच्चे का सेशन, पेरेंट काउंसलिंग, स्टाफ ट्रेनिंग, केस डॉक्यूमेंटेशन – सब कुछ अकेले। छुट्टी के दिन भी वे पेरेंट्स के फोन उठाती हैं क्योंकि वे जानती हैं कि विशेष बच्चे का मूड संडे-मंडे देखकर नहीं बदलता। लोग हैरान होते हैं कि एक अकेली महिला इतना कैसे कर लेती है। असल में थकान तब होती है जब काम बोझ लगे। पायल के लिए ये मिशन है।

तीसरा – सकारात्मकता। विशेष बच्चों के क्षेत्र में नेगेटिविटी बहुत जल्दी घर कर जाती है। “इसका कुछ नहीं हो सकता”, “ये कभी नॉर्मल नहीं होगा” – ये वाक्य पेरेंट्स सैकड़ों बार सुन चुके होते हैं। पायल का पहला काम होता है इस नेगेटिविटी को तोड़ना। वे हर छोटे सुधार को सेलिब्रेट करती हैं। बच्चा अगर आज 2 सेकंड आई-कॉन्टैक्ट कर ले, तो सेंटर में तालियां बजती हैं। क्योंकि वे जानती हैं कि 2 सेकंड कल 20 सेकंड बनेंगे। उनकी पॉजिटिव एनर्जी पूरे सेंटर में फैलती है।

काम करने का जज्बा: हार नहीं मानती

पायल पालीवाल के साथ जुड़े पेरेंट्स कहते हैं कि उनमें एक अलग ही जज्बा है। कई बार ऐसा होता है कि 3-4 महीने की थेरेपी के बाद भी बच्चे में कोई बड़ा बदलाव नहीं दिखता। ज्यादातर लोग उम्मीद छोड़ देते हैं। लेकिन पायल नहीं।

वे तरीका बदलती हैं, थेरेपी बदलती हैं, टॉयज बदलती हैं, अप्रोच बदलती हैं – लेकिन कोशिश नहीं छोड़तीं। वे कहती हैं, “बच्चा सीख नहीं रहा तो गलती बच्चे की नहीं, मेरे तरीके की है।” यह जज्बा ही है जो उन्हें रोज सुबह नई ऊर्जा के साथ सेंटर लाता है। एर्गो किड्स के कई पेरेंट्स ने बताया कि वे दूसरे 2-3 सेंटर ट्राई करने के बाद यहाँ आए थे, और सिर्फ पायल के जज्बे के कारण रुके रहे। एक अकेली महिला का यह समर्पण देखकर सब नतमस्तक हो जाते हैं।

सुधार में खुशी – यही खासियत है

आप किसी से पूछिए कि पायल पालीवाल की सबसे बड़ी खासियत क्या है? जवाब एक ही मिलेगा – उनकी खुशी। जब किसी बच्चे में सुधार दिखता है तो उनके चेहरे की चमक देखने लायक होती है।

एक बच्चा जिसने 3 साल में कभी ‘पापा’ नहीं बोला, जब पहली बार तोतली आवाज में “पा…पा” कहता है – पायल की आँखें भर आती हैं।

उनके लिए हर बच्चा केस फाइल नहीं है। हर सुधार स्टैटिस्टिक नहीं है। हर मुस्कान उनकी पर्सनल जीत है। यही कारण है कि पेरेंट्स उन्हें प्रोफेशनल कम, फैमिली ज्यादा मानते हैं।

एर्गो किड्स और पायल: एक महिला का मिशन

एर्गो किड्स का विजन है कि हर विशेष बच्चे को मुख्यधारा में लाया जाए। पायल पालीवाल इस विजन को जमीन पर उतारने वाली सबसे मजबूत कड़ी हैं। वे सिर्फ थेरेपी नहीं देतीं, वे पेरेंट्स को ट्रेन करती हैं कि घर पर कैसे बच्चे के साथ डील करें। वे स्कूल टीचर्स से मिलती हैं ताकि बच्चा स्कूल में एडजस्ट कर पाए। वे समाज को सेंसिटाइज करती हैं कि विशेष बच्चे दया के नहीं, सम्मान के हकदार हैं। और ये सब काम वे अकेले अपने दम पर कर रही हैं।

आज जब एर्गो किड्स के सेंटर से दर्जनों बच्चे नॉर्मल स्कूल में जा रहे हैं, जब कई बच्चे स्पीच क्लियर करके कविता सुना रहे हैं, जब कई बच्चे खुद से ब्रश करके तैयार हो रहे हैं – तो उसके पीछे पायल पालीवाल की वही ईमानदारी, मेहनत, वात्सल्य और जज्बा है।

निष्कर्ष: एक शख्सियत, एक उम्मीद

पायल पालीवाल जैसे लोग बताते हैं कि डिग्री सिर्फ कमाई का जरिया नहीं, समाज का कर्ज उतारने का माध्यम भी है। उन्होंने एर्गो किड्स के जरिए साबित किया है कि अगर नीयत साफ हो, निष्ठा अटल हो और नजरिया सकारात्मक हो – तो सबसे मुश्किल कहे जाने वाले केस में भी सुधार संभव है।

वे चुपचाप, बिना लाइमलाइट के, अकेले अपने दम पर रोज उन बच्चों का भविष्य संवार रही हैं जिन्हें दुनिया ने ‘असंभव’ का लेबल दे दिया था। समर्पण भाव से, वात्सल्य भाव से, ईमानदारी से।

और जब कोई बच्चा ठीक होकर हँसता है – पायल पालीवाल की आँखों की खुशी बता देती है कि उनकी मेहनत वसूल हो गई। यही उनकी सबसे बड़ी पहचान है, यही उनकी सबसे बड़ी खासियत है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button

You cannot copy content of this page