देवास

महाकुंभ – वो दिखाइए जो दिखाने योग्य है

राजेश व्यास

यकीन मानिए। मैं महाकुंभ की परंपरा, इतिहास के विषय में शून्य ज्ञान रखता हूं। दो दिन पहले एक आध्यात्मिक संत से इस विषय पर बात हो रही थी, उन्होंने बताया कुंभ अब कुंभ जैसा नहीं रहा, कालांतर में महाकुंभ का महत्व हरि चर्चा, साधु संतों विद्वानों की संगोष्ठियों और गृह नक्षत्र के आधार पर आध्यात्मिक स्नान ही रहा है, और इसी का प्रचार प्रसार होता रहा है, किंतु अब कुंभ के नाम पर जो प्रचार प्रसार हो रहा है, वह ठीक नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसा नहीं है कि सबकुछ वैसा ही हो रहा है जो दिखाया जा रहा है, प्रश्न हमारी दृष्टि का है, दृष्टिकोण का है, जबकि वर्तमान में आनलाइन प्लेटफार्म का बहुत सार्थक उपयोग करके हम जो मूल है उसका प्रचार प्रसार करें तो वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों को हम कुंभ के मूल को बेहतर ढंग से समझा पाएंगे, शेष जो दिखाया जा रहा है वह बहुत छिछला और नश्वर है। यह विचार करते हुए मीडिया प्लेटफॉर्म को अपने दायित्व को भी समझना बहुत आवश्यकता है। कुंभ अभी है और हमारे पास समय भी पर्याप्त है।

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