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-राजेश व्यास

राम जरूर आएंगे…
अकसर बातों में बीते हैं पल, जो खास थे
इससे बढ़कर और क्या होगा जब तुम उस वक्त मेरे पास थे
मैं था, तुम थे और हमारी बातें थीं
बातें हमारी, तुम्हारी बातें, कविताएं बनती चली गईं
और हमारी कविताएं समय के हाथों छली गईं
छलावा तो हम सबके साथ हुआ, न जाने ये कैसे और कब हुआ
मेरे स्मृति पटल से तुम्हारी तस्वीर अब धुंधलाने लगी है
मेरी ही कविता आज मुझको छलने लगी है
झील सा खामोश, अासमान सा सूनापन खुद में देखता हूं
जटायु सा लाचार, राम के इंतजार में कब तक जिंदा रहूं सोचता हूं
छलियों से सुना से रामराज्य की बातें करते, क्या तुमने भी सुना है
हां, ये बात और है, राम की तरह दिखने वाले ये लोग राम नहीं हैं
ये शबरी के जूठे बैर तो खा जाते हैं, लेकिन साम्प्रदायिक दंगों में
सबसे पहले शबरी को ही मरवा जाते हैं, ये झूठे, ये गद्दार, ये मक्कार लोग
तुम्हें कहीं टकराएं, तो इनसे दो टूक शब्दों में कह देना
आजादी हिन्दुस्तान की थी, हिन्दुस्तान की है, हिन्दुस्तान की रहेगी
मैं मेरे स्मृति पटल पर तुम्हारी तस्वीर फिर से जिंदा कर लूंगा
फिर से खूब मिलेंगे हम, फिर से बैठेगी डाल डाल से सोने की चिढिया
फिर नहीं होंगी कोई मांगें सूनी
फिर नहीं होंगी जंगी खूनी
तुम आ जाओ, हम मिलकर राम को बुलाएंगे
देखना वो जरूरी आएंगे
मेरे बदन का जटायु से दर्द
मिटाकर
तुुम्हारे शबरी से जूठे बैर जरूर खाएंगे।

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