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ऐसा लगता है जैसे कि जीवन की नदी अपने प्रवाह से बहती है, उसे बहते देना चाहिए, तभी उसकि सार्थकता है, संदर्भ उक्त पुस्तक और उसके शीर्षक से है, उससे भी अधिक उक्त पुस्तक के संपादक से है, संपादक श्रीमती वर्षा व्यास जोकि धार्मिक तौर पर मेरी अर्धांगिनी है, किंतु बहुत मायने में वो मेरी दोस्त, मेरा प्रेम या यूं कहें कि मेरे जीवन रूपी नदी का प्रवाह वही है, बात दरअसल यह है कि इस पुस्तक का संपादन किया उन्होंने है किन्तु उसमें कविताएं मेरी हैं, वे कविताएं जो मैं बाल उम्र से एक दौर तक लिखता रहा फिर नदी के प्रवाह में यह एक पक्ष कहीं छूट गया था, मुझे तो याद भी नहीं था, मैं या मेरे भीतर कोई कवि भी है, मैं यह भी भूल गया था, सैकड़ों कविताएं यह पुराने पन्नों पर उकेर कर मैं भूल चुका था, मुझे नहीं पता था कि मेरी इस धरोहर को उन्होंने मुझे बताए बिना वर्षों से संभाल रखी थीं, और आज दशहरे पर मेरे जन्मदिन पर मुझे एक बेहतरीन अंदाज में उपहार के तौर पर मुझे भेंट की तो मेरी आंखें नम हो गईं, मेरे भीतर का कवि जाग उठा कविता फिर जिंदा हो गई और उन सैकड़ों कविताओं को पुनः जीवन मिला, नदी के इस जीवन नदी के प्रवाह में फिर काव्य फूट गया, किनारे मुस्कुरा उठे, आप थोड़ा इंतजार कीजिए जल्द ही यह उपहार आपके समक्ष एक बेहतरीन पुस्तक के तौर पर गुलाब की भांति आपके हाथों में पहुंचेगी और आपको भीतर तक महका देगी, भिगो देगी प्रेम से। यही जीवन की नदी का प्रवाह है इसे ऐसे ही बहते देना चाहिए जो लौटना है वह लौटकर अवश्य आएगा जो अनावश्यक है वह छूटता जाएगा।

धन्यवाद इस पुस्तक के संपादक और आप सभी को।

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